आदि माग ( चार नाठक )

उपेन्द्रभाभ 'अश्क

साहित्यकार संसद

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प्रथमा वूते १० प्रकाशक साहित्यकार संसद, प्रयाग सूहय इंटिक ७) साधारण ४] पक उमममोवकरमाापमलककंअकांजब्क: हरप्रसाद वाजपेयी सं+ २७०७

कृष्णा-प्रेस, २६ हिवेट रोड, प्रयाग

माँ की पृरव-स्मृति में

ईन नाटकों को खेलने से पहले लेखक की आ्राशा लेना आवश्यक है |

ग्राल इडिया रेडियो के पास इन नाटकों का अविकार नहीं | प्रत्येक नाठक के लिए लेखक को रायलटी देना अनि- वाय्ये है

पिना लेखक की अनुमति के इनमें से कोई नाटक किसी संकलन में दिया जाय।

अपनी बात

दिवताओं की छाया मे, तूफान से पहले,” “चरवाहे,' क्ोंद और उडान' के बाद मेरे नाटकों का यह पांचवा संग्रह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हैं। छुठा बेटा! को छोड़कर ( जो १६३८-४० में लिखा गया ) शेष तीनों नाठक १९६४२ के मध्य से १६४३ के मध्य तक, लगभग एक वर्ष के समय में लिखे गये

जहां तक लम्बाई का प्रश्न है, इसके नाटक पहले तीन संग्रहों से भिन्न और चौथे सग्रह के निकट हैं। श्रमी कुछ दिन पहले दिल्ली के एक संकलनकरतां ने “उडान को एकांकी सम्रद् में दे दिया। उड़ान! एकाँकी होकर पूरा नाटक है। इसी प्रकार 'केद,” “मेंबर! और “छुठा बेटा” भी पूरे नाटक हैं; चाहे फिर ये तीनों एक दिन में समास हो जाते हैं, बल्कि छुठा बेटा तो वास्तव में उतनी ही घढ़ियों में समास हो जाता है जितने में कि यह रंगमंच पर खेला जाता है

प्रस्तुत संग्रह में श्रादि मार्ग” को आप एकांकी कह सकते हैं। 'अंजों दीदी” को भी खींच खांचकर एकांकी की परिधि में लाया जा सकता है, पर भिंवर” श्रौर 'छुठा बेटा? तो पूरे नाटक हैं। उसी अकार जैसे “कैद” और उड़ान! पूरे नाटक हैं। आधुनिक एकांकी तथा आधुनिक बड़े नाटक की कला पर यहाँ कोई केख लिखना मुझे! श्रभीष्ठ नहीं, इसलिए इस ओर संकेत भर कर दिया है। आधुनिक एकांकी और बडे नाटक में जो अ्रन्तर है, उसे बिना जाने कुछ संक लन- कर्ता बड़े नाटकों को एकांकी सप्रहों में दे देते हैं। यह बात जहाँ उनके अशान की परिचयाक है वहाँ पाठकों के अ्रशान में भी वृद्धि करती है

कुछ संकलनकर्ता पहले नाठक पुस्तक रूप में छाप जेते हैं फिर आशा! भाँगते हैं। यह बात बड़ी कष्ट-मअद-स्थिति पैदा कर देती है। मुझे इसी कारण इस बार दो एक मामलों में श्रदालत की शरण लेनी पडी साधारण संकलन कर्ताओं और प्रकाशकों को भारत के कापी राइट एक्ट का ज्ञान नहीं, जिसके कारण यह भद्दी स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं। सकलनकर्ता ऐवा करें, इसके लिए ये चन्द पक्तियाँ पूर्व-सूचना के रूप में लिखना में अपना कतेब्य समझता हूँ

खुसरों बाग रोड़, प्रयाग उपेन्द्रनाथ अश्क

फरवरी १६५०

ऊुटह. # मं अ्सा

मैं नाटक कैसे लिखता हैँ ! आदि मार्ग

अंजो दीदी

भंवर

छुटा बेटा

एप, दे, ११ १५७

“कोई सुन्दर कलाकृति लेखक ही से नहीं, पाठक से भी ( अलोचक से और भी अधिक ) सूफ-बूकक और संतोष की अपेत्षा रखती है |”

मैं नाटक कैसे लिखता हैँ

इस किसे का उत्तर देने के लिए जब में शिछले कुछ वर्षो पर हृष्टि- निपात करता हूँ तो पाता हूँ क्वि नाटक लिखने के लिए मेने कोई विशेष कला- बाजी नहीं लगायी | जिस ग्रकार मेज-कुर्सी' पर बेठ कर, कलम दवात था फाउन्टेन पेन की सहायता से, मेंने कहानी या उपन्यास लिखे है, उत्ती प्रकार नाटक ! (कविताओं का उल्लेख मेंने इसलिए नहीं क्रिया कि कविताएँ मैंने कभी बेठ कर नहीं लिखीं। कमरे में टहलते; ट्राम, बस या गाड़ी में यात्रा करते; ग्रातः संध्या घूमते अथवा सोने की चेश में बिस्तर पर'करवटों बदलते बदलते मैंने अपनी अधिकांश कविताएँ लिखी हैं। अपनी एक प्रत्तिद्ध लम्बी कविता मैंने अटारी से प्रीति नंगर तक, दस मील का लम्बा मार्ग, एक पुराने से इक्के पर पार करते हुए लिखी ) किन्तु कहानी और इसी प्रकार नाटक मैंने प्राय। कमरे में मेज-कुर्सी पर बैठ कर लिखे हैं

सुना है, स्व० ग्रेमचन्द बिस्तर या फश पर पेट के बल लेट कर तकिये के सहारे लिखा करते थे और जब कभी लिखने में तल्‍लीन हो जाते थे तो घुटनों के बल पाँव ऊपर उठा लेते थे और (निमरनता की न्यूचनता अथवा आधिक्य के अनुस्तार ) टॉँये हिलाते रहते थे। में कभी फर्श पर बेठ कर या लेट कर कोई चीज नहीं लिख पाया। ग्रेज (चाहे फ़िर वह सेकेंड हैंड छोड़ थर्ड हैंड ही क्यों हो ) और कुर्सी (चाहे वह यद्देदार होकर लकड़ी की कठोर खुर्तीं सीट वाली ही क्‍यों हो ) मेरे लिए सदा कलम- दवात की भाँति लिखने की आवश्यक सामग्री में से रही है |

निम्न-मध्य-वर्ग में जन्म लेकर, यथेष्ट अभाव में दिन गुजारने पर भी, यह साहबी स्वभाव मुझे कैसे पड़ गया, जब में इसका कारण खोजने के लिए अपने बचपन पर दृष्टि डालता हैं तो अपनी समस्त दिलचस्पी के साथ एक पटना मेरे मस्तिष्क में विधुत सी कौंद जाती है|

में पाँचवी या छुटी श्रेणी में पहता था जब हमारा पुराना खरबहर सा मकान बनना आरम्भ हुआ। यद्यपि आरम्मिक योजना केवल इतनी थी

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आदि सांग

कि एक चौवारा और रसोई-घर गिरा कर नया बनवा लिया जाय, किन्तु हमारे पिता जी हर बात कुछ बडे परिसाण पर करने में विश्वास रखते थे। उन्होंने सारे का सारा पुराना मकान गिरवा डाला और उसे फ़िर नये पिरे से दो- मजिला बनवाने का निश्चय कर लिया भोर जहाँ माता जी ने पाँच सो, हजार का अनुमान लगाया था, वहाँ वो हजार रुपया खर्च कर डाला और बाद में वर्षों ऋण उतारते रहे |

उन्हीं दिनों जब मकान बन रहा था, पिता जी एक संध्या माता जो से पचास रुपये लेकर सीमेंट लेने बाजार यये जब लोटे तो हसने देखा कि सीमेंट के बोरों के बदले उनके पीछे पीछे कुली दो मेजें, चार कुर्तियाँ और एक बेंच उठाये हुए चले रहे हैं मेजें सुन्दर थीं, किन्तु उनका गहरा हरा, मृ'ग॒ के रंग का कपड़ा बिलकुल उड़ गया था और वे उत्तके बिना सूनी सूनी लगती थीं। कुसियों में से एक बेंत-पिहीन थी और दूसरी का बेंत इतना नीचा हो यया था ब्वि सीट में यढ़ा बच गया था। रहा बेंच, सो वह भी जीणोडार की अपेच्ता रखता था। पूछने पर पता चला कि मार्ग में एक स्थान पर नीलामी हो रही थी, थे सीमेंट के बोरों के स्थाव पर वह सब कक खरीद लाये हैं

मैंने देखा सामान बाहर रखवा कर वे बड़े गव॑-स्फीत स्वर में अपनी इस कार्य-पटुता की अशसा चाह रहे थे। मुरम्भ भोर पालिश के बाद वह सब सामान बेठक और आँगन में किस ढहय से सजाया जायगा, इसका सक्त्तार ब्योरा दे रहे थे और भीतर आधे बने आँगन में माँ बैठी सोच रही थीं कि पचास रुपये तो ये कबाइखाने में खर्च कर आये, अब सीमेंट के लिए रुपया कहाँ से आयगा ?

इसमें कोई सन्‍्देह नहीं' कि यदि उत्त सामान की मुरम्मव हो जाती तो वह बुरा लगता, किन्तु जब मकान ने एक कमरे और रसोई-धर से बढ़ कर आठ दस कमरों का रूप घारण कर लिया और पर पर का ऋण सिर पर चढ गया तो उन मेजों पर कपड़ा लगवाना तो दृर रहा, उन पर पालिश का एक हाथ भी फिर सका | उन्हीं दो मेजों में से एक मेरे भौर मेरे छोटे भाई के अधिकार में आयी और एक दो वर्षों को छोड़ कर ( जब छोटे भाई के नित नये ऋगड़ों से ऊब कर मैंने एक चौकी ही से मेज का काम

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मै नाटक कैसे लिखता हूँ

लिया ) वह मेज मेरे अधिकार में रही और में सेज-कुसी पर बेठ कर काम करने का कछ ऐसा अभ्यस्त हुआ कि जब बी० ए० पास करने पर लाहौर यया आर चालीस रुपया मासिक पर बन्दे मातरम! के सम्पादक विभाग का सदस्य कहलाने का गौरव ग्राप्त करने लगा, चयड़ मृहल्ले में दो अंधेरी सीलमरी कोषठडियाँ भी मुझे किराये पर्‌ मिल गयीं और अवकाश के समय कुछ लिखने की समस्या समझ्ष आयी तो उत्त सेज का वियोग बडा अखरने लगा | कोठड़ी के फर्श की दशा इस योग्य थी कि उस पर बैठ कर या लेट कर कुछ लिखा जाये इसलिए तुरन्त मेज लाने का निरचय किया |

चालीस रुपया मासिक में से, घर का खर्च चला कर, इतने पैसे तो क्या बचते कि में नयी मेज खराद सकता, किन्तु पहला वेतन मिलते ही जो पहला काम मैने किया, वह यह था कि पिता जी के पद्‌-चिन्हों पर चलते हुए, अनारकली के एक सेकेंड-हैड-डीलर से आबूनस की एक सेक्रेंड-हैड मेज- कुर्ती स़रीद लाया वह मेज-कुर्सी इतनी सुन्दर थी कि उस सौल भरी आऑधकाराकान्त कोठडी में विलापिता (प्रद्पा'7) से कम लगती थी | उसी मेज पर मैं आठ वर्ष तक काम करता रहा और उसी पर बेठ कर मेंने अपने पहले नाटक भी लिखे

ये पक्तियाँ लिखते समय कौन जाने, वह मेज पाकिस्तान के किसी कबाड़ खाने में चली गयी है और पुतः नयी चमक-दमक के साथ मेरे जैसे किसी विपनन महात्ाकांत्ती लेखक की बाट देख रही है, अथवा किसी कारोबारी के क्लर्क की फ़ाइलों का भार वहन कर रही है ! भाई साहब अनारकली छोड़ते समय अपने और मेरे सब फर्वीचर को वहीँ छोड़ आये थे। मुझे दूसरे 7५ की कमी याद नहीं आयी, पर उत्त मेज की स्मृति बराबर जाती है |

किन्तु मेंज-कुर्सा अपनी तमस्त धुख-सुक्धि के बावजूद मुझे डेढ़ दो घंटे से अधिक बाघ कर नहीं बेठा सकी जब मैं यह सुनता हैँ कि अमुक लेखक ने एक ही बेठक में पूरी की पूरी कहानी या अमुक ने नाटक समाप्त कर डाला तो मुझे उनसे ईर्षा भी होती है और उनकी इस ग्रतिया पर विस्मय भी--सोचता हूँ, या तो वे अपनी योग्यता दिखाने के लिए यप हाक देते हैं या फिर ग्रेत के तगादों के कारण जैसा-तैसा बन पड़ता है मन को

र्ई

आदि मार्ग

जकड़ कर लिख फ्रेकते है अथवा वे सचमुच अभूतपूर्व प्रतिभा के स्वामी हैं एक ही बेठक में दो-चार बार तो अच्छी चीज लिखी जा सकती हे, किन्तु सदैव कोई ( अखबारी नहीं, साहित्यिक ) उच्तम रचना रज देना मुझे असम्भव सा लगता है। मैं स्वय तो, दो चार अवसरों को छोड़ कर, एक ही बेठक में दस-बीस पक्तियो या दो-एक प्रष्ठों से अधिक कभी नहीं लिखनचयाया | यह बात नहीं कि प्लाट मेरे मस्तिष्क में नहीं होता, या अस्पष्ट होता है, या विचारों का क्रम दूट जाता है, था कोई उपसा नहीं सूकती, वरन्‌ जब विचार प्रबल वेग से बह रहे होते हैं, उत्त समय भी कुछ ऐसी घबराहट होने लगती हे कि में सहता कलम छोड़ कर कमरे में टहलने लगता हूं या बातें करने लगता हूँ या पढ़ने लगता हैं कई बार ऐसा भी हुआ कि नाटक लिखते लिखते में कियी दूसरे की कृति पढ़ने लगा और उत्तमें इतना तलल्‍्लीब हुआ कि मेरा नाटक अधूरा ही रह गया |

किन्तु विचित्र बात यह है कि इस अकार बहते हुए विचारों का क्रम तोड़ने पर भी कभी ऐसा नहीं हुआ कि मेरे विचार पितर-वितर हो गये हों और जब पुत्र: मेने कलम उठायी हो तो उस क्रम को पकड़ ने पाया होडें। सदेब ऐसा होता हे कि जहाँ से में लिखना छोड़ता हैं, फिर आकर जब बेठता हूँ, वहीं से प्रारम्भ कर देता हैँ। कह बार में वाक्य तक अधूरा छोड़ कर उठ जाता हूँ और जब दोजशरा बेठता हूँ तभी वाक्य समा करता हैं। यही वहाँ, कई बार जब वास्तव से विचारों का कम रुक जाने; कोई उपमा सूकने; या किसी अत्पष्ट क्चिर के स्ष्ट ने होने; अथवा कोई सम्भाषण चूक पाने के कारण लिखना छोड़ कर उठता हूँ तो ( मैने ग्रायः देखा हे) जब फिर बेठता हूं, वह विचार, उपसा था। सम्भाषण स्पष्ट होकर कागज पर भा जाता है। लगता है जेसे प्रकट दूपरी बातों में लगे रहने पर भी मस्तिष्क निरन्तर उतती सम्बन्ध में सोचता रहता है

किन्तु इस अकार घीरे धीरे लिखने पर भी कमी यह नहीं हुआ कि नाटक की जो पाडु-लिए मैंने तैयार की वही अन्तिम हो। मेरा स्वभाव है कि पहली बार नाठक का घुँपला सा रेखा-फिन तैगार कर लेता हैं ( वत्तव में वह सब विकलता और घबराहट इसी पाडु-लिपि की तैयारी में ह्वोती हे ) इसके पहश्चात्‌ में उसे निरन्तर सँवारता-सुघारता रहता हैँ

रे

मै नाटक कैसे लिखता हूँ

इस काम में मेरा मन खूब लगता है। में निरन्तर काट-छाट करता रहता हैँ और जब तक चौजदग्रेस में नहीं चली जाती, मेरी सलस्नता में कमी नहीं आती। इस प्रकार कई नाटक मुझे दूसरी तीसरी से लेकर पाँचवीं छुठी बार तक थी लिखने पडे हैं। पहला या दूसरा मसोंदा तेयार करने पर मे मित्रों को ( यदि अवसर मिले तो ) सुनाता भी हैँ और उनका परामर्श भी लेता हूँ, किन्तु प्रायः ऐसा भी हुआ हे कि मित्रों की तुष्टि हो जाने पर भी मे सन्तुष्ट नहीं हुआ और नाटक में सशोधन-परिवर््दन करता रहा। ऐसे नाटकों की कमी नहीं जो रेडियो पर बड़ी सफलता से आड- कास्ट हुए, किन्तु जब मैंने पुस्तक के लिए उनकी अन्तिम पाडं-लिपि तेयार की तो उन्हे बिलकुल बदल दिया

परन्तु में नाटक कैसे लिखता हूँ? इसके उत्तर में सम्भवतः इतना कह देना ही पर्याप्त नहीं कि में मेज-कुर्सों पर बेठ कर, कायज-कलम-दवात लेकर, दो या दत बैठकों में, दो या दस बार लिखता हैं। यह शच्द कैसे! कदाचित्‌ मुझ से नाटक के कला-पक्त के सम्बन्ध में भी कुछ कुछ कहने का अनुरोध करता है

में सर्ब-अथम नाटक की थीम अर्थात्‌ आधारभूत विचार खोजता हूँ अथवा यों कहिए कि नाटक का आधारभूत विचार पहले मेरे मस्तिष्क से आता है। किन्तु कई बार ऐसा भी होता है कि इस आधारभूत विचार से पहले किसी मनोरंजक पात्र श्रथवा सुन्दर दृश्य को देख कर मेरे मन में उसे नाटक का अग बनाने की हच्छा उत्तन होती हे और यही इच्छा नाटक लिखने को ग्रेरित करती है

“हारा जंगल का सब साज सदा रहती है दूब हरी”

चरवाहों के इस सरस, स्वतन्त्र यौत ने मुझे 'चरवाहें लिखने पर विवश किया | में रेडियो स्टेशन दिल्‍ली के देहाती विभाग में बैठा हुआ! था जब पंडित हृदयराम ने मुझे यह यीत अपने विशेष “हरयाने के स्वर में गाकर सुनाया। मुझ पर ऐसा प्रभाव हुआ कि इसी यीत को पृष्ठभूमि में रख कर मैंने 'चरवाह्े! का सूजन किया श्ड्‌

आदि भाग

वर्षा ऋतु में एक ग्रात+ में सब्जी सन्‍डी दिल्ली के सर्माप रिज्ज पर सेर करने गया। बादल अभी अमी छूटे थे, पर बड़ी नन्‍हीं नन्‍हीं फुहार पड़ रही थी। इस ठंडे, भीगे, प्रकाश-घुले घुघलके में में पीर गायब” के मजार पर चढ़ा नीचे वन के विटप जैसे अन्तर के उल्लास से रूम रहे थे ओर पहाड़ी पर उपर से नीचे को जाती हुईं भीगी भीयी सड़के गाते; के उज्याले में चाँदी की नन्‍हीं नन्‍्हीं नदियाँ लग रही थीं। तभी सहता मेरे मन में विचार उठा कि ऐसा भी व्यक्ति हो सकता है जो इतने सौन्दर्य के निकट होते हुए भी इसका दर्शन कर पाये और विद्यत की सी गति से मेरे एक मित्र की लड़की की आकृति मेरी आँखों में कौंद' गयी, जो छः वर्ष रौढ़ की हड्डी के नायूर से बिस्तर पर बेंधी पड़ी रही था। यही लड़को “चिल्लमन! की किरण बनी और इस सौन्दर्य को एक नजर देखने के लिए छुटपदाती रही

अभी हाल ही में एक नाटक का विचार मेरे मन ग़ालिब के प्रसिद्ध शेर--कदे-हयातो-बन्दे गम ''' को पढ़ कर में उत्पन्न हुआ। में जब भी गालिय का दीवान लेकर बेठता, आय/ इस गजल को पढ़तां | बार बार पढ़ने से यह शेर मेरे मन-मस्तिष्क पर अंकित हो गया और फिर इसी ने जीवन की एक पूरी ट्रेजेडी का रूप पारण कर लिया |

शेरों, गीतों और सुन्दर दृश्यों के अतिरिक्त कई बार मनोर॑जक पात्र भी मुझे नाटक लिखने की प्रेरणा देते हैं। “अंजों दीदी! आज भी मेरे सम्मुख है। 'बिठा बेटा'--सौ पृष्ठ का यह नाटक मेंने एक पात्र ही को देख कर लिखा | इसी अकार भेंवर और ुम्बक! विभिन्न पात्रों के किसी किसी नाटकीय पक्ष ही का चित्रांकन करते हैं |

विभित्र वातावरण भी नाटक लिखने की प्रेरशा दे सकते हैं, भौर मेरा विचार कुछ ऐसे नाटक लिखने का भी हैं जो किसी पात्र के बदले पूरे के पूरे वातावरण का चित्र उपस्थित करें |

ऐसी दशातओं में जब आधारभूत विचार बना बनाया मस्तिष्क में नहीं आ्राता और प्रेरष्मा किसी अन्य वस्तु से होती है, मैं सदेष मूलभूत विचार सोच निकालता हूँ। अब में इस पर नाटक की इमारत

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में नाटक कैसे लिखता हूँ

केसे खडी करता हूँ, इस विषय में कोई घरडी-घड़ायी विधि में अस्तुत नही कर सकता बचपन से मेरी प्रवृत्ति नाटकों की ओर रही है; बचपन ही से मेने द्विजेद्धलाल राय, आगा हश्र, बेताब, राधेश्यास, रहमत आदि के नाटक पढ़े है; कालेज और कालेज के पश्चात्‌ अनेक नाटकों मे अभिनय किया है और बाद*में, जब मे पुस्तकें खरीद सका, मैने लगभग सभी प्रसिद्ध पश्चिमीय और पूर्वाय नाटककारों की रचनाएँ पढी है; नाटक के आवश्यक उपादानों का परिचय पाया है, पुरातव और आधुनिक ढयग के नाटकों का अन्तर जाना है और अभ्यास से झामे की कला पर अधिकार गाप्त कर लिया है। जब मैंने एफ ए० में एक बार एकाँक्री लिखने का ग्रयात्त किया तो उस समय भारतवर्ष में एकाकी लगभग अग्राप्प था कृषि टेगोर के एक दो नाटक मेरे सम्मुख थे और पडित सुदर्शन की एक कामेडी--

आनरेरी मैजिस्ट्रेट' / किन्तु उस समय मुझ्के नाटक के, विशेषकर आधुनिक नाटक के, आवश्यक अवयवों का ज्ञान था; इसलिए चेष्ट करने पर भी में

सकल नाटक लिख पाया। कुछ हास्यास्पद नामों के साथ एक हास्थास्पद्‌

सी वस्तुस्थिति पर मैंने एक प्रहसन लिखा, किन्तु उस समय भी मुझे सन्‍्तोष

ने हुआ और बाद में कई बार लिखे जाने पर भी वह इस योरय बन सका

कि किसी संग्रह का अंग बने |

?९३९६ में मेरी पहली पत्नी का देहान्त हो गया ओर इस अवसर पर कुछ कुप्रथाओं का मेरे मन पर इतना प्रभाव हुआ कि एक दिन जब मैने समय काटने के लिए, अपने छोटे भाईं के कोर्स की एकाॉंकी नाटकों की पुस्तक उठायी तो पहला चाटक पढ़ते ही एक घटना एकाकी का रूप पार कर मेरे समक्ष गयी और मेंने दो दिन में लच्मी का स्वागत! लिख डाला। कला की दृष्टि से यह आज भी मेरे श्रेष्ठ एकांकी नाटकों में से हे। उन्हीं दिनो मेंने पृधतम ढय का एक लम्बा ऐतिहापिक नाटक जय पराजय! लिखा जो बाद में कई विश्वविद्यालयों के पाठ्य-कम में सम्मिलित हुआ | इसके परचातू ज्यों ज्यों में आधुनिक नाटक पढ़ता गया, मेरे मन में आधु- निक ढंग के अपेक्षाकृत छोटे नाटक लिखने की इच्छा अबलतर होती गयी | कुछ इसलिए भी कि आजकल जन-तसाधारण के पास बड़े बड़े नाटक देखने या पढ़ने का समय नहीं और कुछ इसलिए कि ये छोटे नाटक अधिक साभाविक लगते है भोर वास्तविकता का अम ( 7॥0४8508 था 26०४9 ) उत्पन् कर देते हैं। फिर कहानीकार होने के कारण मुक्के छोटे वाटक पसन्द थे। एक

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आदि सार

कारण यह भी था कि मैं स्वयं उन दिनों कहाँ नौकर ने था; भर सतनन्‍त्र रूप से काम करता था, मेरा सारा दिन मेरा अपना था और दिन भर केवल कहानियाँ सोचना ओर लिखना मेरे लिए असम्भत्र था। मन चाहता था कि जब कहानी लिखने की रूचि हो तो फीई और चीज लिखी जाय | मेरे मस्तिष्क में कुछ ऐसी घटनाएँ सुरक्षित थी जो अह्मनों के बदले नाटक रूप में अपेक्षाकृत अच्छे ढंग पर उपस्थित की जा सकती थीं, ऐसे अपत्तरो पर में नाटक लिखने का प्रयास करता रहा

उस समय से लेकर अब तक मेंने--सामाजिक, राजनीतिक, सॉकरतिक, मनोपैज्ञानिक--सभी प्रकार के नाटक लिखे भीर पढे हैं। पश्चिम के अ्रप्तिद्ध नाटककारों में मुझे इबतन, मेतरलिक, स्ट्रिडबर्य, चेखोब, पिभोनोर, ओ- नील, कॉफ्मेन, मॉाँहिम, बेरी, प्रस्टले ने सदा नाटक लिखने की अ्रेरणा दी है। मेंने शा, गाल्जवर्दी, पिरिन्देलो, भर दूसरे अमरीकी, जापानी और योरुपीय नाटककारों को भी पढ़ा है। में उन कलाकारों की महत्ता को मानता हैँ, शिन्‍्तु इनमें से अधिकांश को पढकर,चाहे मुझे कितना भी आनन्द क्‍यों मिला हो, जाने क्यों, लग कोई नाटक लिखने की ग्रे रणा नहीं हुई सम्भ- बतः इसलिए कि शायद मेरी प्रकृति उनसे मित्र है। मैंतरलिकया औओ-नील का नाठक में चाहे दूधरी या तीततरी बार ही क्यों पढे, सदेव मुर्खे नाटक लिखने के लिए प्रेरित करता है भीर उसे पढ़ कर मेरे मस्तिष्क में नाटक के जो आधारभूत विचार पक रहे होते हैं, उनमें से कोई कोई भस्पष्ट विचार सर्वथा स्पष्ट होकर नाटक का रूप पारद कर लेता है (यहाँ प्रशतिशीलता अथवा प्रतिकियात्मकता का जिक्र नहीं। में सात्र कलायक्ष की बात कर रहा हैं नाटककार अयवा नाटक चाहे अगतिमूलक हो, पर कह बार के कला का सौडव मुझे मोह लेता है और स्वर्य लिखने की प्रेरणा

हैं

. मैंने जीवन की विमिन्‍्नता का आभास पाया है भौर भोड़ा-गहुत अनुभव भी ग्राप्त किया है समाचार-पत्र के एक साधारण रिपोर्टर के रूप में जीवन-संघर्ष आरम्प करके मेंने अध्यापक, अनुवादक, सम्पादक, पक्ता,

श्द

में नाटक कैसे लिखता हूँ

विज्ञापन-विशेषज्ञ, वकील, रेडियो-आटिस्ट, अभिनेता और सिनारिस्ट की हेपियत से मॉति-भॉति के अनुभव ग्राप्त किए है; भाँति-मॉति के लोगों से मिला हैं और असख्य सुखद अथवा दुखद घटनाएँ मेरे मस्तिष्क में सुरक्षित पृदी है। जब भी अपने प्रिय नाठककारों को पढ़ते पढ़ते (कई बार नये पास होने के फारण पुराने ही पढ़ता हैं ) मुझे नाटक लिखने की प्रेरणा होती है तो उनमे से कई घटनाएँ, कई पात्र और कई दृश्य आप से आप मेरे आधारभूत विचारों में से किसी एक में फिट हो जाते हैं और नाटक तैयार हो जाता है। कोर भी पात्र, चाहे वह क्रितना भी मवोर्जक क्‍यों ने हो, शायद ही कभी अपने यथार्थ रूप में नाटक का अंग बनता है | आधारभूत विचार की आवश्यकता के अनुसार उस पर रंग चढ़ जाता है

कई बार वास्तव जीवन के कई पात्र मिल कर नाटक के एक पात्र में समा जाते हैं और यह सम्मिलन एक नये पात्र का स॒जन कर देता है। सित्र रसायनक द्वव्यों के समावेश से जो नया द्रव्य बनता है, जिस प्रकार उसमें उन सब के गुण-दोषों के साथ साथ अपने स्वतन्त्र गुण-दोष भी होते हैं, उसी प्रकार यह नया पात्र भी उन पात्रों के चरित्रों का सार तो अपने में रखता ही है, परन्तु इसका अपना सतन्‍्त्र व्यक्तित भी होता है। भेंवर' की ग्रतिभा।! इस समावेश का प्रमाण है |

जब में दिल्‍ली में था तो मेने तीन लड़कियों को देखा। उनमें दो हिन्दू थीं भर एक मुसलमान, परन्तु उनके जीवन की उलकन और व्यग्रता मुझे बढ़ी हद तक एक सी लगी। कर बातें उनमें सम्राव रूप से विधमान थीं |

उदाहरखणत: ?. तीनों अ्रमिजात वर्ग से सम्बन्ध रखती थी २. तीनों बड़ी पढ़ी लिखी थीं--एक इंग्लिस्ताव हो आयी थी,

दूसरी एम० ए० में फर्स्ट रही थी, तीसरी उप्त समय एम्र० ए० में पढ़ रही थी। तीनों अपने को अबल' बुद्धिवादी ( 2॥69४१४०४४८०४ ) मानती थीं

२. तीनों ने अपने योवनारम्म में किसी ऐसे व्यक्ति से प्यार किया था जिसे वे मित्र कारणों से अपना जीवन-साथी बना पायी थौं। १६.

आदि भाग

४. उस पहले प्यार के पहचात्‌ जब तीनों ने विवाह किया तो अपने वैवाहिक जीवन को सफल ने बना सकी। वे अपने पतियों को छोड़ बेआ थी अथवा वे उनसे अलग हो गये थे |

पू, तीनों की उनकी इस कवेवाहिक असफलता “ने एक विचित्र आकर्षण प्रदान कर दिया था। भव के विशाल वक्त पर वे मुक्त लहरियों सी बह रही थी। नयी लहरियों से मिलती थीं, कुछ पला साथ साथ चलती थीं, फिर असन्तुष्ट होकर अलग हो जाती थीं। यात्ित्र के उप पथ्िक की भाँति जिसके मुँह से कवि से कहलाया है १--

चलता हूँ थोड़ी दूर हर इक रादरौ के साथ पहचानता नहीं हूँ अभी राइबर को में !

हैं. यद्यपि उनके इस विचित्र आकर्षश की आया में कई शलम अपने प्राण गंवा रहे थे, परन्तु वे स्वर्यं भी अपने ही आप जलने वाली दीपशिखा की भाँति निरन्तर पुलग रही थीं।

इन तौनों पात्रों के समापेश ने मिंवरँ की प्रतिभा का रूप धार लिया। प्रतिभा में उनके चरित्रों के सार स्वरूप थे बातें तो आप पायेंगे ही, परन्तु इसके साथ ही उसका अपना अलग व्यक्तितल भ्री--जों भेंवर के चक्कर में घूमने वाली एक उम्मि का सा हे--तिज्ञ पाठकों को अवश्य मिलेगा |

कई बार आधारभूत विचार कहीं से मिलता है भौर पात्र कही ते और दोनों एक दूसरे में समा जाते हैं |

तात आठ वर्ष की बात है। एक दिन आतः मैं जीत नयर से लाहौर २५

मे नाटक कैसे लिखता हूँ

को जा रहा था। ग्रीत नगर से अठारी के अड्डे तक दस मील का मार्य इक्फे पर ते करना पडता है। लोपगोक़े से इकफे की पिछली सीट पर दी वृद्ध मुसलमान ख्रियाँ सवार हुईं एक्र बुढ़िया अपने बडे लडके के यहाँ किसी उत्सव पर लोपो रे आयी थी और उस समय वापस अपने छोटे लड़के के पास जा रही थी जहाँ कि उन दिनो वह रहती थी अपनी बडी बहू के दुर्व्यवहार से तय आकर, वह उत्सव की बीच ही से छोड, लड-लडा कर चली आयी थी। दस मील की यात्रा का एक-तिहाई भाग उसने अपने बडे लडझे और बह को गाजियाँ देने में गुज[रा--सास होने के नाते अपने बेटे और बहू से उसकी वही शिकायतें थी जो पुरातन काल से कर्कषा ओर ईर्षालु सासो को होती आयी हैं--फिर जब उसके मन का उबाल' कुछ शान्त हुआ तो उसने अपने दुख की कहानी कहयी आरम्भ कौ-कितत प्रकार पति के मर जाने पर उसने स्वयं मेहनत-मजूरी करके अपने तीनों बच्चों को पाला ***'** किस प्रकार बडा बेटा उस कर्मीनी बडी बहू के आते ही अलग हो गया''**** किस अकार उसने अपनी आशाएंँ मेंकले पर केद्धित की किन्तु उस बड़ेकी देख कर वह भी विवाह के पश्चात अलय हो गया... ...। तब बुढिया कई मील तक मेंकले लडके और उसकी बहू को गालियों देती रही अन्त में उसने अपने छोटे लड़के का जिक्र आरम्भ किया कि वह कितना सुशांल, समझदार आर आज्ञाकारी है। खुदा के बाद यदि वह किसी पर यकीन रखता है तो वह उसकी यही बुढ़िया माँ है। अपने छोटे लड़के के गुणों का बसान करते करते वृद्धा की वाणी की कर्कृंषता एक विचित्र आदर -तरल-स्निग्घता में परिणत हो गयी अपनी गेली ओढ़नी से अपनी वाक साफ़ करते हुए

अन्त में उसने सजल वाणी में कहा कि बस वह तो खुदा से दिन-रात्र यही दुआ करती है कि उसके बच्चे का धर बस जाय तो उसके मन को भी सुख- शान्ति मिले |

उसकी इस आकांक्ाा को सुन कर मन ही मन में हँस दिया सुख- शान्ति की वह उसकी हसरत ऐसी थी जिसका पूरा होना उस परिस्थिति में असम्भव सा था। निश्चय ही वह तीसरे बेटे का विवाह करेगी --सेंने सोचा--उसी अरमान और चाव से जिसके साथ उसने पहले दो पत्रों का विवाह रचाया था, परन्तु उसका वह तीसरा पृत्र अपने भाइयों के पद- चिन्हों पर चलेगा, इसकी कोई सम्भावना थी, क्योंकि उस बुढ़िया के रहते किसी का उस पर में रहना उतना की असमभ्भव था जितना किस

२१

आदि मार्ग

बहू के रहते उसका रहना उसकी वह आकांक्षा मुर्क मानव की उस छली आकांत्ता का प्रतीक लगी जो कभी पूरी नहीं होती |

उत् यात्रा के बाद, इके का वह सफ़र, बढ़ बुढ़िया, उत्तकी बातें, उपत्तकी वह कभी पूरी होने वाली आकांक्षा गेरें मन सस्तिष्क में घूमती रही। मेरा विचार उस पर कहानी लिखने का था, परन्तु फिर अपने ही आस-पास मुझे कुछ ऐसे पात्र मिल गये जिनकी आकाक्षा भी उत्त वृद्धा की भाँति कभी पूरी होने वाली थी, तब मैंने उत्त मूलभूत पिचार में ये नये पात्र फ्रिट कर दिये और छुआ बेटा तैयार ही गवधा। पंडित बसन्तलाल और उस कर्कषषा वृद्धा में यदि सूक्म दृष्टि से देखा जाय तो पहुत 'भन्तर ने दिखायी देगा |

छुठा बेटा माँ की (पंडित बसन्‍्तलाल और उस कर्कषा इद्धा की भी) उस आदकांत्षा ही का प्रतीक है जो कभी पूरी नहीं होती |

पात्रों और आपारभूत विद्वार के अतिरिक्त कई बार भिन्न भिभ्र स्थानों पर देखे हुए दृश्यों अथवा घटनाओं का भी समावेश एक ही नाटक में हो जाता है | वास्तव में नाटक लिखने की किया मित्र रतायनक द्रव्यों के समावेश से नया द्रव्य तैयार करने ऐसी ही है| कहाँ %हाँ से क्या मिलाकर एक नयी कृति तेयार हो जाती है, इसका व्योरा ठीक से देना असम्पव नहीं तो कविन अवश्य है। कहे बार किसी पात्र के कृत्य का कारण ढंढ़ने और पाने के प्रयास में उत्का अक्ट रूप ही बदल जाता है और वह अपने आन्तरिक रुप में, अथवा उस रूप में कि जिसमें मैं उसे देखता हैँ, नाटक का पात्र बन जाता है |

मुझे किसी प्रत्तिद नाटक का अनुवाद करने, विचार चुराने अथवा उसकी शैली का अनुकरणु करने की कभी शच्छा नहीं हुईं | उन बढ़े नाटककारों की सकल करना या उनके कोषों से विचारों के मोती चूराना मैं उनकी और ऋपनी

ब्र्‌

मैं नाटक कैसे लिखता हूँ

प्रतिभा का अपमान समझता हूँ और जैसा कि स्ट्रिंडबर्य ने एक स्थल पर लिखा है :--

28784. दशददे 0॥ #79 87॥978988707 99966 00 4908 ०७ वस्लॉफा ढाातदोें 9070779 #ै४8 दं॥075084 706, ईप/:८6 80 282/ 00077 30%४7"८88.

( मैतरलिक ने मुझ पर जो प्रभाव डाला उससे प्रेरणा श्राप्त कर ओर उस महान कलाकार से दृष्टि की गहराई उधार लेकर में अपनी ही अनु- भूतियों की ओर झुका )

में भी उन महान नाटककारों से प्रभावित होकर, अपनी हाँ अनु- भूतियों से नाटक की सामग्री आध करता हें और “आप-बीती! अथवा 'जग-बीती! को नाटकों का रूप देता रहता हू ।#

पचगनी ९९ जून १९४८ | उपेन्द्रनाथ अश्क

कक >माकिसनाक 4७ कारक. स्‍तर हिन-सापदि पाता वे महाआसाक ९४४७ “२५०3 का/मेमा+ िकिकी।०+ ७७ सैर, अमल

(48: -3॥-फ़थंतापकूक 3 कक 2फाकनिद ७: कसकातमाक्‍के 55 ला अअ १5३5 ७३७७४

६#इस लेख का कुछ भाग आल इंडिया रेडियो लखनऊ से ब्राढ्काह्ट हो बुका है। स्टेशन ढरेक्टर भाल इंडिया रेढियो लखनऊ के सौजन्य से, यथेष् परिवर्धन के बाद, इस संग्रह में सम्मिलित किया जाता है।

शव

5७०५३| #थआाक! १माइेम कफ"

पात्र तारा चनद शिव राम बज नाथ सरदारी लाल बून्दाबन, पूरण, सन्‍्तू , रानी, राजी

( पर्दा पडित ताराचंद को बैठऊ में खुलता है यह बैठक नेग्रे और पुराने का अद्‌हुत मिलान उपस्थित करती है, क्योंकि इस में कोच भी लगे है, तिपाइयों भी रखी है और एक तख्त पर गाव-तकिया भी लगा है

बायीं दौवार में एक बडी खिड़की है, तर्त इसी के बराबर बिछा है खिडकी पर पर्दा लटक रहा है, शायद पुरा नहीं खींचा ग््या, क्योंकि खिढ़की का आधा भाग दिखायोदे रहा है, जिसके शोशों में से बाहर बागीचे के पेंड-पौचे दिखायी देते हैं

दायीं दीवार में भी पक देसी ही खिंडकी है, जिसके अधघखुले पढे से चबूतरा और उसके परे बागीचा दिखायी देता है खिडकी के इधर को एक दरवाद्ा है जो बाहर चबूतरे पर खुलता है, बाग से होकर बैठक भें आने का यही दरवाजा है (

सामने की दीवार के दयें कोने में एक दरवाज़ा है जो आँगन में खुलता है। दरवाजे पर पर्दा लग्क रहा है, किन्तु पढें के हटने पर आँगन ओर आँगन के परे बरामदे का एक भाग, पानी का नल और हौज साफ़ दिखायी देते हैं

सामने दीवार के साथ कोच का सेठ, तख्त से आँगन के दरवाज्ष तक, इस ढग से लगा है कि बायीं आर के कौच पर बैठा हुआ व्यक्ति तर्त पर बैठे हुए आदमी से बडी सुगमता से बातचीत कर सकता है

दौवारों पर अबतारों के चित्र भी लगे हैं श्रोर महात्मा गाँधी तथा पढ़ित जवाहर लाल के भी, परन्तु उनमें माकंस और लैनिन के खिन्र जाने किसने लगा दिय्नेहे! सम्मदत पंडित जी के लड़के पुरणु ने लगाये है और पडित जी को कदाचित उसने यह कह दिया है कि में भी अदतारों हो के न्तित्न हैं

सुबह का समय है खिको के शीशों से हलको-हलकी धुप कमरे में रही है | पर्दा उठने पर पडित ताराचंद हुकक्‍्का पीते दिखायी देते हैं कोर शिवराम तख्त के बराबर ही कोच पर

बर्फ

आदि माग

आगे को झुके हुए बैठ रहे हैं। लगता है जैसे अभो ऋआमे है, क्योंकि टोपी अभी तक उनके हाथ में है, जिसे वे पर्दा उठते समय तरुत पर रखते दिखायी देते है

कुणु मर के लिए ताराचद हुक्का गुडगुडाते है. फिर

रानी को अषाऊ देते है ]

ताराचंद :; राती : शिवराम ;

रानी बेटा मैंने पानी लाने को कहा था।

( श्रॉगन से ) ला रही हूँ, पिता जी |

अरे भई, कोई ऐसी जल्दी नहीं। इतनी दूर से पैदल ही चला आया, इसलिए कुछ प्यास सी लग रही थी, पर ऐसी भी क्‍या मुसीबत है कि... ...

( रानी औंगन के दरवाद से पानी किये प्रवेश करती है )

रानी : शिवराम ;

ताराचंद :

रानी ; ताराचंद : रानी ;

शिवरास :

ताराचंद :

लीजिए चना जी [

(गिलास बैते हुए) जीती रहो बेटा! / ( दो पक धूँ& पीकर गिलास तिपाई पर रख देते हैं | रानी गिलास उठाने लग्ती है ]

नहीं, श्रमी गिलास ले जाने की जरूरत नहीं। में अभी और पीजँगा पीरे-पीरे पानी पीने का सभाव है मेरा |

( हुक्‍्का गुब्णुढाते हुए ) सन्‍्तू को सेज देना गिलास लेने। कहाँ हे सनन्‍्तू ( जी, सब्जी-तरकारी लेने गया है मारकेद तक | जब आये, भेज देना | जी, बहुत अच्छा (उली जाती है ) क्यों भई, रानी के विषय में क्या निश्चय किया है तुमने ! बेचारी आधी भी नहीं रही /

रानो ही के हुल की दवा कर रहा हूँ शिवराम | अपनी ओर से में इस बात का पूरा पूरा ध्यान रखता हूँ कि उसे

श्प्र

शिवराम :

ताराचद :

शिवराम : ताराचद :

शिवराम : ताराचंद :

आदि मार्ग

किसी ग्रकार का कष्ट हो ( हुक्का शुब्गुडाते है) उसने दोबारा कालिज में दाखिल होना चाहा और यधद्षि लड़कियों की शिक्षा को में अधिक पसन्द नहीं करता, लेकिन पूरण के जोर देने पर मेंने इसका प्रबन्ध कर दिया। उसने याना सौखना चाहा और यद्यपि में नाच-गाने को, जेसा कि तुम जानते हो, डोस भीरा- सियों की चीज समझता हूँ पर पूरण के कहने पर, ओर इस बात का विचार करके कि रानी को अपना दुख हर समय खलेगा, मैंने सूरदास हरिराम को उसे गाना सिखाने के लिए लगा दिया ( हुक्‍्के का रूम्बा कशु लगा कर तनिक मेदभरे सूर में ) यही नहीं, मेंने अभी त्रिलोक का भी पीछा नहीं छोड़ा। बन्दाबन को उसके पीछे लगा रखा है भौर वह उसे मनाने की पूरी चेष्टा कर रहा है ( फिर हुकक्‍्का गुडगुढाते और खौँसते हें ) में जानता हैं अपनी सारी शिक्षा, कला और अपने समस्त गुणों के होते भी रानी पिह के इस लम्बे दुख की सहन कर सकेगी

घन चोरी हो जाय या खो जाय ताराचंद, मनुष्य संतोष से बेठ जाता है, किन्तु पास होते हुए भी, अपना होते हुए भी, उसे हाथ लगाने की आज्ञा हों इस बात से जो कष्ट होता है, उसे मन ही जानता है

ईश्वर तुम्हारा भला करे / ( हुक्के का लम्बा कश झूगा कर ) इसीलिए में इस जतन में हूँ कि त्रिलोक आकर उसे ले जाथ |

क्या कहता हे वह !

अभी तक तो अपने हठ पर अड्ा है। वास्तव में बात यह है शिवराम कि इस विवाह से उसे बहुत आशाएँ थीं और जब उसने देखा कि उसकी आशाएँ उसकी कल्पना के अनुसार पूरी नहीं हुईं तो उसने इस बात का समस्त क्रोध बेचारी रानो पर निकाला |

आशाएं ? उसे आशा थी कि दहेज में एक मकान और मोदर १९

शिवराम *

ताराचद ;

शिवराम : ताराचंद :

पूरण :

ताराचद्‌ . पूरण :

ताराचंद :

आदि माग

अवश्य मिलेगी, किन्तु मकान छोड़ जब उसे मोदर भी मिली, ..... (पूरणु बाहर चबूतरे पर दिखायी देता है। क्षण भर के लिए खिडकी में से मीतर ऑॉकता है, फिर ड्राइंग रूम की आर आता है )

उसे मकान और !मोटर की क्या आवश्यकता है ? उसके पिता के अपने मकान है और मोटर भी है

( हँस कर ) किन्तु त्रिलोक के अतिरिक्त उसके पिता के पाँच और मी तो पूत्र हैं। बांटने पर शायद किसी मकान की बैठक और मोटर का कोई पूर्जा ही उसके हाथ लगे

( पूरण कमरे में आता है किन्तु दोनों को बातों में निम्न देखकर पल्ल भर के लिए चौखट में खड। सुनता है।

क्या कहते हो ? उनके तो इतने मकान हैं [

सब गिरवी रखे हुए हैं। हमें तो पता ही चला, नहीं

में कभी रानो का विवाह वहाँ करता |

( हँएता है) इस बात का पता चल जाता तो कोई और

बात परदे में रह जाती | विवाह तो आज-कल अंधेरे में

तौर मारने के समान है निशाने पर लग गया तो लग

गया, नहीं हाथ से निकला तार ती वापस अआता नहाँ।

जब दोनों पक्ष ऋूठ बोलने में एक दूसरे से बाजी ले जाने

की चिन्ता में हों तो सच का पता पाना कठिन हे

( हुक्का गुड्णुब्ाना छोड कर तीचुएु कठु स्वर२ में ) कहाँ से

आये हो पूरण आवारायदी करते

आवारा-गर्दी में और-ठिकाना कहाँ ! तभी जगह घूमता

आया हैं |

तुम्हें कभी तब्रीजण से बात करनी भी झआयेयी !

शिवराम से ) और शिवराम, तुम कहा करते थे--बच्चों

को जितना हो सकते पढ़ाना झहिए | ये महाशर्व एम० ए० 2०]

पूरण : ताराचद . »

पूरण ५; ताराचंद ,

प्रण ताराचद :

राती ;

पूरण .

आदि सागे

है और सुनता हूँ कि अपनी श्रेणी में प्रथम रहे थे। पूछो क्या करते है ? ( मुह बना कर) आवारागर्दा तो आखिर आप ही कहिए क्या करूँ ? ( ग्ज॑ कर ) में कहेँ ! मेरे कहने से क्‍या होता हे! ( शिवराम से ) में इसके लिए कितने मित्रों के सामने बुरा नहीं बना शिवराम / राय साहब ग़नीयत राय की सिफारिश से बड़े दफ्तर में नोकर कराया ( नब रू उतारते हुये ) “मुझे यह क्लर्की पसन्द नहीं है।” बुरा-सा मूँह बना कर ये महाशथ वहाँ त्यागपत्र दे आये। लाला गुलजारी लाल की मिन्‍्नतें करके उनकी फर्म में नौकर कराया, चार दिन बाद वहाँ से छोड़ आये। पृछा--क्यों! " उत्तर मिला-- “दिन भर झूठ बोलना पडता है।” कोई पूछे, सत्यवादी हरिश्चन््र के अवतार तो बस तुम्हीं हो, शेष सारी दुनिया भूठ बोलती है। सर सीताराम की मिल में मैनेजर की नौकरी दिलायी, सप्ताह भर से अधिक वहाँ टिके। पूछा--क्यों'? पता चला--भजदूरों पर अत्याचार इनसे सहन नहीं होता (फिर पूरण से ) अब बताओ, तुम्हें और क्या करने को कहें ! सुबह कहाँ जाने को कहा था, कुछ याद है में उनसे बात करना भी अपना अपमान समझता हूँ लाट हैं भारत का तू ( झुंद्द चिढाते हुए) बात करना भी अपमान समझता हैं बहिन का सारा जीवन संकट में हे और ये महाशय उसके पति से बात तक करना अपमान सममते हैं में जानता हूँ, उनके साथ बहिन का जीवन .. .. .... ( आर मी गज कर ) चुप रहों और अपनी यह फिलासफी अपने पास रखो बहुत सुन चुका हूँ ( आँगन से ) पूरण भय्या, तनिक इधर आना, यह ट्रक जरा नीचे उतरवाना आया रानो

३१

ताराचद्‌ .

शिवराम ;

ताराचद :

शिवराम ; ताराचंद :

शिवराम :

आदि माग

( चला जाता है ) जरूरत से ज्यादा शिक्षा ने लडके का दिमाग खराब कर दिया हे ( हुक्का झुड्णुडाते है) मुझे कभी-कभी आशंका होती है कि यह अपने साथ रानो कोशी ले डबे। स्त्री का स्थान उसके पति का घर है शिवराम, माता पिता के पास लड़की कितने दिन रह सकती हे ? बडे बडे राजा महराजा लड़कियों को अपने घर नहीं रख सकते ताराचंद, फिर हमारी-तुम्हारी तो बात ही क्‍या है / ईश्वर तुम्हारा भला करें (हुक्के का कशु लगा कर ) तुम्ही कहो रानी अपने घर जायगी तो क्या आयु भर यहाँ बेठी रहेगी ? में उसे जो शिक्षा दिला रहा हैं सो उसका कारण यही है कि त्रिलोक की उससे जो शिकायत है, वह दूर हो जाय, नहीं उसे नौकरी तो करनी नहीं

भले परों की बहू-बेटियाँ कही नोकरी करती हैं ! ईश्वर तुम्हारा भला करे | यह साला जो आज भाई बना फिरता है, कल यदि मेरी श्राख बन्द हो जाय तो बात भी पूछेगा। देखो शिवराम, शन लोगों के किये ती कुछ होगा नहीं। थे सब नादान छोकरे हैं। इन्हें यह समझे नहीं कि कौन सी बात करने की हे और कोन सी नहीं | तुम्हें इतने सबेरे कष्ट देने का उद्देश्य यह भी था कि तुम स्वय॑ त्रिल्ञोक से मिली और किसी ने किसी तरह रानी को बुलाने के लिए उसे तैयार कर लो। देखी, त्रिलोक के पिता से तुम्हारी भ्रच्छी मित्रता रही है। उस पर भी दबाव डालो। यदि वह मेरा मकान ही लेना चाहता है तो में अपना पुराना मकान उत्त के नाम कर दूंगा आखिर जयाई और बेटे में भेद ही क्या है? रानी अपने घर सुखी रहे, में और मकान बनवा लूँ गा | परन्तु रानी से उसे शिकायत क्या हे !

श्द

ताराचद ६;

शिवरास ; ताराचंद :

शिवराम : ताराचंद :

/ रानी : ताराचंद *

रानी : ताराचंद :

रानी : ताराचद :

आदि मार्ग

दर्सियो शिकायतें हे--वह सुशिकत्षित नहीं, सुसंस्क्षत नही, सुन्दर नहीं, विनञ्र नहीं, मेँह-फट हे, सास ससुर का आदर नही करती .. तुमने रानी को समझाया नहीं? अरे भाई, जब वह पिछले वर्ष रोती हुईं आयी, तो सेने समकाबुझा कर उसे वापस भेज दिया था | परन्तु वास्तव में इसके अतिरिक्त रानी का कोई दोष नहीं कि बह त्रिलोक की आशा के अनुसार दहेज में एक मोटर आर मकान नहीं ले गयी ? तुम्हें यह कैसे मालम हुआ ? हुईं थी तुम्हारे सामने इस बात की चर्चा ! ( हुआ गुडशुडा कर ) अरे यह तो बक गया ( नौकर को आवाज देते हे ) सन्‍्तू, सन्‍तू / ( ऑगन से ) क्या बात